कुरआन क्या है ?

मस्जिद कल और आज

मस्जिद कल और आज

उपमहाद्वीप भारत में तो मस्जिदों का और बुरा हाल है, अन्य समुदायों की देखादेखी सप्ताह में एक बार शुक्रवार को नमाज में उपस्थित होना मुक्ति का उपकरण माना जाता है

उपमहाद्वीप भारत में तो मस्जिदों का और बुरा हाल है, अन्य समुदायों की देखादेखी सप्ताह में एक बार शुक्रवार को नमाज में उपस्थित होना मुक्ति का उपकरण माना जाता है

आज की इस सभा में मेरी बातचीत धरती के उस स्थान से संबंधित होगी जो अल्लाह के नज़दीक सबसे प्रिय, पाकीज़ा और पसंदीदा है, जो उम्मत का धड़कता हुआ दिल है और अल्लाह से मुनाजात की जगह है।

जानते हैं यह जगह कौन सी है? जी हाँ! यह अल्लाह का घर मस्जिद है जहां मन और मस्तिष्क का शुद्धिकरण होता है, दिल की पाकी सफाई होती है, दया की बारिश होती है, जहां शासक अपना दरबार, व्यापारी अपनी व्यापार, मजदूर अपनी मजदूरी, किसान अपनी कृषि, मनेजर अपना आफिस और शिक्षक तथा क्षात्र अपना शैक्षिक व्यवसाय छोड़कर मुअज़्ज़िन की पुकार पर लब्बैक कहता है।

यह वह धन्य जगह है, जहां पहुंचने वालों के लिए अल्लाह जन्नत में मेहमानी तैयार करता है, यह महान जगह है जिसकी ओर वुजू के साथ क़स्द करने वालों का एक एक कदम पर पाप मिटता और एक पद ऊंचा होता है। यह वह पवित्र स्थान है जहां अंधेरे में आने वालों को न्याय के दिन प्रकाश की बशारत सुनाई जाती है।

तात्पर्य यह कि मस्जिद अल्लाह से संबंध, बंदगी, आत्मसमर्पण, विनम्रता और आत्मा की शुद्धता का सेंटर है।

 अल्लाह वाले और मस्जिद:

बड़े भाग्यशाली हैं वे लोग जिनका दिल मस्जिद में अटका रहता है, न्याय के दिन महशर के मैदान में नफसी नफसी का आलम होगा, अंधेरे छाये होंगे, इंसान हैरान और परीशान होगा, उस समय जिन लोगों को अर्श की छाया के नीचे जगह मिलेगी उन में वे भाग्यशाली भी होंगे जो इबादत की खातिर मस्जिद से अपने संबंध जुड़े रखते हैं।

 

बुखारी और मुस्लिम की बहुत मशहूर हदीस है कि अल्लाह तआला क़ियामत के दिन सात तरह के लोगों को अपने अर्श की छाया में रखेगा जिस दिन अल्लाह तआला की छाया के अलावा और कोई छाया न होगी, उनमें से एक होगा:

ورجلٌ قلبُهُ مُعَلَّقٌ في المساجدِ  صحیح البخاری: 1423 صحیح مسلم: 1031

 “ऐसा आदमी जिसका दिल मस्जिद में अटका रहता है”।(सही बुखारी: 1423 सही मुस्लिम: 1031)

यही कारण है कि अल्लाह वालों ने मस्जिद से ऐसा संबंध जमाया कि ज़माने तक उनकी प्रथम तकबीर छूट न सकी। रबीआ बिन यज़ीद कहते हैं:

ما أذن المؤذن لصلاة الظهر منذ أربعين سنة إلا وأنا في المسجد إلا أن أكون مريضاً أو مسافراً   

चालीस साल से जब कभी मुअज्ज़िन ने ज़ुहर की अज़ान दी, मैं मस्जिद ही में रहा, सिवाए इसके कि मैं बीमार हूं या मुसाफिर।

इमामुत्ताबिईन सईद बिन मुसय्यिब कहते हैं:

مَا فَاتَتْنِي التَّكْبِيرَةُ الأُولَى مُنْذُ خَمْسِينَ سَنَةً  

“पचास साल से मेरी पहली तकबीर न छूटी”।

वकीअ बिन जर्राह कहते हैं कि आमश सत्तर साल के हो गए थे लेकिन उनकी पहली तकबीर कभी छूटी नहीं थी, बल्कि कुछ विद्वानों के बारे में आता है कि नमाज़ की पाबंदी के ख़्याल से मस्जिद में फरोकश हो गए थे। इसी लिए इमाम अता बिन अबी रिबाह बीस वर्ष तक अपना बिस्तर मस्जिद में डाले रहे ताकि पहली तकबीर और जमाअत कभी छूट न सके।

मस्जिद का इतिहास:

मानव इतिहास की पहली मस्जिद काबा है जिसके निर्माण का श्रेय अल्लाह के दो वफ़ाशेआर दास हज़रत इब्राहीम और हज़रत इस्माईल अलैहिमास्सलाम को प्राप्त हुआ जिसे कुरआन करीम ने यूं बयान किया है:

إِنَّ أَوَّلَ بَيْتٍ وُضِعَ لِلنَّاسِ لَلَّذِي بِبَكَّةَ مُبَارَكًا وَهُدًى لِّلْعَالَمِينَ  سورہ آل عمران: 96

“अल्लाह का पहला घर जो लोगों के लिए नियुक्त किया गया है मक्का (शरीफ) में है जो मुबारक और सारी दुनिया के लिए हिदायत का केन्द्र है”।

जी हाँ! यह वह धरती है जिस में खैर और बरकत रखी गई थी और जिसे सम्पूर्ण संसार के लिए केंद्र बनाया गया था। अल्लामा इकबाल ने इसी ओर संकेत करते हुए कहा है؎

              दुनिया के बुत कदों में पहला वह घर ख़ुदा का

               हम उसके पासबाँ हैं वह पासबाँ हमारा

और जब सातवीं शताब्दी ईसवी में अन्तिम संदेष्टा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का आगमण हुआ तो आप तेरह साल तक कुफ़्फ़ार और मुश्रेकीन के उत्पीड़न को सहन करते रहे, जब शांती का सांस लेने का मौका मिलता है, यानी मदीना की ओर यात्रा करते हैं तो आप के दिमाग में सबसे पहले इसी महत्वपूर्ण केंद्र अर्थात् मस्जिद के निर्माण की भावना पैदा होती है, इसी लिए यात्रा के बीच जब कुछ दिनों के लिए क़ुबा में ठहरे तो इस आध्यात्मिक केंद्र का निर्माण किया जो आज मस्जिदे क़ुबा के नाम से प्रसिद्ध है।

फिर मदीना पहुंचने के बाद अपने निवास की परवाह किए बिना पहली मस्जिद का निर्माण कर के यह साबित कर दिया कि समाज की पहली कड़ी मस्जिद ही है, यह वही मस्जिद है जिसे आज हम मस्जिदे नबवी के नाम से जानते हैं, यहीं से इस्लाम का संदेश चारों ओर फैला, यहीं सफ्फ़ा वाले ईमान और अमल का पाठ प्राप्त करते थे, यही मस्जिद संसद और मजलिस-ए-शूरा भी थी, यहीं हर अदालत के फैसले होते थे, यही मस्जिद जेल भी थी, यही मस्जिद सरकारी यात्री गृह और लंगर गृह भी थी, यही मस्जिद बैतुलमाल भी थी, यही मस्जिद युद्ध कला सीखने का स्थान भी थी, यही मस्जिद अस्पताल और चिकित्सा स्थल भी थी, और यही मस्जिद सरकारी अतिथि गृह भी थी, इसी मस्जिद में सरकारी प्रतिनिधिमंडल का इस्तेमाल होता और उन्हें मुसलमानों की सामूहिक वैभव की अभिव्यक्ति के लिए यहाँ ठहराया जाता था, जब सहाबा के एक दल ने यमामा के सरदार सुमामा बिन उसाल को कैद करके नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की सेवा में पेश किया तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आदेश से उसे मस्जिद के एक स्तंभ ही में बांधा गया था।

मस्जिद में काव्य एंव साहित्य की महफ़िलें जमती थीं और इस्लाम के कवि हज़रत हस्सान बिन साबित रज़ियल्लाहु अन्हु के लिए मिम्बर रखा जाता था जिस पर आप खड़े हो कर रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से मुदाफिअत का हक़ अदा करते थे और अपने इस्लाम पर फख़्रिया कलाम पेश करते थे। अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया:

إنَّ اللهَ يُؤَيِّدُ حسانَ بروحِ القُدُسِ ، ما يفاخرُ ، أو ينافِحُ عن رسولِ اللهِ صلَّى اللهُ عليه وسلَّمَ   سنن الترمذی: 2846 

“अल्लाह जिब्रील अमीन द्वारा हस्सान को बल प्रदान करता रहेगा और उसका समर्थन करता रहेगा जब तक वह अपने इस दिफा के कर्तव्य को अंजाम देते रहेंगे।”  (सुन्न तिर्मिज़ी: 2846)

इतिहास के हर दौर में मस्जिदों की भूमिका:

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और बाद के करीबी अवधि में मस्जिदें केवल पूजा और धार्मिक संस्कार के लिए आरक्षित नहीं थीं, बल्कि धार्मिक आर्थिक, सामाजिक, देशी सीमा, रक्षा, शैक्षिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक मामलों के समाधान के लिए एक केंद्रीय स्थान थी, जिस में यदि एक ओर मुसलमान इबादत की अदाएगी करते थे तो दूसरी ओर पेश आमदा मामलों और आर्थिक मुद्दों पर काबू पाने के लिए विचार भी करते थे, अगर एक तरफ यहां से दाइयों और प्रचारकों का दल निकलता था तो दूसरी ओर सीमा की सुरक्षा और देश में अमन-चैन बनाए रखने के लिए करारदादें भी पास होती थीं।

इस मस्जिद ने अगर एक तरफ हज़रत अबु बकर, हज़रत उमर, हज़रत उस्मान और हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हुम जैसे ख़ुलफ़ाए राशिदीन बनाया तो दूसरी ओर हज़रत अबू हुरैरह, हज़रत आइशा, हजरत इब्ने उमर और हज़रत इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुम जैसे मकतरीन हदीस भी जन्म दिया।

इस मस्जिद के गहवारे में अगर एक तरफ इमाम अबू हनीफा, मुहम्मद बिन हसन अश्शैबानी और इमाम शाफई जैसे फक़ीह (शास्त्री) ने तरबियत पाई तो दूसरी ओर इमाम बुखारी इमाम मुस्लिम, इसहाक बिन राहवैह, इमाम मलिक और इमाम तिर्मिज़ी जैसे मुहद्दिसीन को जन्म दिया।

अगर नहीं जानते हो तो इतिहास से पूछो! जामि अम्र बिन आस क्या था? दिमश्क की उमवी मस्जिद क्या थी, बग़दाद का जामि अल मंसूर क्या था? जामि क़ुर्तूबा उंदलुस क्या था? जामि अल-अज़हर काहिरा क्या था? जामि अल-करवीन क्या था? और फिर जामि कूफा इराक़ क्या था? यह मस्जिदें केवल पाँच समय की नमाज़ों की अदाएगी तक सीमित न थीं बल्कि मुसलमानों के शैक्षणिक संस्था और विश्वविद्यालय  का काम भी करती थीं, शिक्षा और ज्ञान की रोशनी फैलाती थीं, बड़े बड़े विचारक और धर्म-प्रचारक पैदा करती थीं।

मस्जिद से पूछो कि किसने उसके आगोश को तकबीर और तहलील से सुरुचिपूर्ण किया, ज्ञान और शिक्षा से आबाद किया और कुरआन की तिलावत से मुनव्वर किया, जवाब देगी मुसलमानों ने।

 मस्जिद से पूछो कि किसने उसके गुंबद से सत्य की आवाज़ बुलंद की, ख़ुतबों के मोती बीखेरे और मानव हृदय में ईमान को जागृत किया, जवाब देगी मुसलमानों ने।

 मस्जिद से पूछो कि किसने उसके मिनारे से नास्तिकता को खत्म किया, न्याय का नारा लगाया, और मानव बुद्धि को जिहाद और बलिदान और फिदा करने के लिए प्रेरित किया, जवाब देगी मुसलमानों ने؎

पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है

जाने न जाने गुल ही न जाने बाग तो सारा जाने है

लेकिन बड़े खेद की बात है कि बाद के युग में मस्जिद का अर्थ बहुत सीमित होकर रह गया, मस्जिदें पूजा-स्थल समझी जाने लगीं और बस, इस विचार को सबसे पहले मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने लोगों में परवान चढ़ाया और अधिकतर लोगों ने उसका समर्थन किया, इस तरह मस्जिद को अमित के मामलों से अलग कर दिया गया।

मस्जिद तो बना ली छन भर में ईमान की हरारत वालों ने

मन अपना पुराना पापी है वर्षों में नमाज़ी बन न सका

 

कभी मस्जिदें हमारी ताकत और शक्ति तथा वैभव का रहस्य थीं और हमारी इज़्ज़त सम्मान का गुणवत्ता, जिसका एहसास दुश्मनों को भी हुआ था, इसी लिए मुस्तश्रिक़ (orientalist) जौलिद ज़ीहर जिसकी कारस्तानी इस्लाम दुश्मनी में प्रसिद्ध है कहता है।

مازال المسلمون فی قوۃ مادام معھم القرآن والمسجد

जब तक मुसलमानों का कुरआन और मस्जिद से संबंध रहा वह शक्ति और वैभव के मालिक रहे। लेकिन अफसोस कि

वह सज्दा रूहि ज़मीं जिस से कांप जाती थी

उसी को आज तरसते हैं मिंबर व मेहराब

उपमहाद्वीप भारत में तो मस्जिदों का और बुरा हाल है, अन्य समुदायों की देखादेखी सप्ताह में एक बार शुक्रवार को नमाज में उपस्थित होना मुक्ति का उपकरण माना जाता है, कुछ लोग मस्जिदों में तो आते हैं लेकिन आध्यात्मिक शांति प्राप्त करने के लिए नहीं बल्कि थकान दूर करने के लिए, मस्जिद के चबूतरों और साइबानों में बैठकर ग़ीबत, चुग़ली और दोष लगाने में लगे रहते हैं।

अल्लाह पाक हम सब को हिदायत प्रदान करे। आमीन या रब्बलआलमीन

 

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