कुरआन क्या है ?

रमज़ान के अन्तिम दस रातों की फज़ीलत

रमज़ान के अन्तिम दस रातों की फज़ीलतअल्लाह तआला की सुन्नत है कि कुछ चीज़ों को दुसरी चीज़ों पर सर्वश्रेष्टा देता है। मानव को सम्पूर्ण दुसरी वस्तुओं पर उत्तमता प्रदान किया है। मानव में रसूलों और नबियों को दुसरे सर्व मानव पर सर्वश्रेष्टा प्रदान किया है और नबियों में मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को सब रसूलों तथा नबियों पर फज़ीलत दी है। महीनों में हुर्मत वालें महीने को दुसरे महीने पर उत्तमता प्रदान किया है। जैसा कि अल्लाह तआला का कथन हैः

إِنَّ عِدَّةَ الشُّهُورِ‌ عِندَ اللَّـهِ اثْنَا عَشَرَ‌ شَهْرً‌ا فِي كِتَابِ اللَّـهِ يَوْمَ خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْ‌ضَ مِنْهَا أَرْ‌بَعَةٌ حُرُ‌مٌ ۚ ذَٰلِكَ الدِّينُ الْقَيِّمُ ۚ فَلَا تَظْلِمُوا فِيهِنَّ أَنفُسَكُمْ ۚ. (9- سورة التوبة: 36

” वास्तविकता यह है कि महीनों की संख्या जब से अल्लाह ने आकाश और धरती की रचना की है, अल्लाह के लेख में बारह ही है और उन में से चार महीने आदर के (हराम) हैं। यही ठीक नियम है, अतः इन चार महीनों में अपने ऊपर ज़ुल्म (अत्याचार) न करो।” (5- सूरः तौबाः 36)

इन चार महीने की स्पष्टिकरण हदीस में कर दी गई हैं, यह हुरमत वाले महीने जूल क़ादा, जूल हिज्जा, मुहर्रम और रजब हैं। जैसा कि हदीस में वर्णन हुआ है। अबू बकरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपने हज्ज के भाषण में फरमायाः ” निःसंदेह समय चक्कर लगा कर अपनी असली हालत में लौट आया है। जिस दिन अल्लाह ने आकाशों तथा धरती की रचना किया। वर्ष में बारा महीने होते हैं। उन में से चार आदर के (हराम) महीने हैं। तीन महीने मुसलसल हैं, जूल क़ादा, जूल हिज्जा, मुहर्रम और रजब मुज़र जो जुमादिस्सानी और शाअबान के बीच है……” (सही बुखारीः 4662 और सही मुस्लिमः 1679)

दिनों में जूल हिज्जा के महीने के आरम्भिक दस दिन सब से सर्वश्रेष्ट हैं।

रमज़ान के अन्तिम दस रातों की फज़ीलतः

इसी प्रकार रमाज़ान के महीने की अन्तिम दस रात सब रातों में सब से उत्तम है। जिस के रातों की बरकतों को प्राप्त करने के लिए नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) बहुत ज़्यादा प्रयास और कोशिश करते थे। पूरी तैयारी करते थे।

जैसा कि उम्मुलमूमिनीन आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) हदीस वर्णन करती हैं।

كان رسولُ اللهِ صلَّى اللهُ عليهِ وسلَّمَ يجتهدُ في العشرِ الأواخرِ، ما لا يجتهدُ في غيرِه.   (صحيح مسلم: 1175

रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) रमज़ान के अन्तिम दस रातों में इस कदर इबादतों में मेहनत करते थे कि उस कदर दुसरी रातों में इबादतों में महनत तथा कोशिश नहीं करते थे।  (सही मुस्लिमः 1175)

كان النبي صلَّى اللهُ عليهِ وسلَّمَ يخلط العشرين بصلاة ونوم فاذا كان العشرشمّر وشدَّ المِئزَرَ.    (مسند أحمد

नबी (सल्ल) रमज़ान के आरम्भिक बीस रातों में नमाज़ भी पढ़ते और सोते भी थे परन्तु जब अन्तिम दस रातें शुरू हो जाती तो पूरी तरह से इबादत करने में जुट जाते थे और बिस्तर हटा दिया जाता था। (मुस्नद अहमद)

كان رسولُ اللهِ صلَّى اللهُ عليهِ وسلَّمَ، إذا دخل العشرُ ، أحيا الليلَ وأيقظ أهلَه وجدَّ وشدَّ المِئزَرَ.   (صحيح مسلم: 1174

जब रमज़ान के अन्तिम दस रातें आरम्भ हो जाती तो रसूल (सल्ल) पूरी रात जागते थे और अपने परिवार के लोगों को भी इबादत के लिए जगाते थे। और आप (सल्ल) पूरी तरह से इबादत करने में जुट जाते थे और बिस्तर हटा दिया जाता था। (सही मुस्लिमः 1175)

इन हदीसों से प्रमाणित होता है कि रसूल (सल्ल) ने बहुत ज़्यादा रमज़ान के अन्तिम दस रातों में अल्लाह तआला की इबादत में व्यस्त हो जाते थे। रातों में जाग कर केवल अल्लाह की इबादत करते थे।

इन मुबारक रातों में दो महत्व इबादत है। जिन के माध्यम से अल्लाह को खुश कर के बहुत ज़्यादा नेकिया प्राप्त किया जा सकता है।

इतिकाफ और क़द्र वाली रात

इतिकाफ क्या है ?

इतिकाफः किसी वस्तु पर कठोरता से जमे रहने को इतिकाफ कहते है।

इस्लामी परिभाषाः अल्लाह की अनुसरण और इबादत के लक्ष्य से सीमित समय के लिए अपने आप को मस्जिद में सीमित कर देना इतिकाफ कहलाता है।

इतिकाफ कुछ छण और कुछ घंटे और कुछ दिन तक के लिए किया जा सकता है। इतिकाफ किसी भी मस्जिद में किया जा सकता है। जिस में नमाज़ होती हैं।

रमाज़ान के महीना में इतिकाफ करना सुन्नते मुअक्किदा है। क्योंकि मक्का से हिजरत के बाद से मदीना में हमेशा नबी (सल्ल) ने इतिकाफ किया है। नबी (सल्ल) की पत्नियों ने आप (सल्ल) के बाद हमेशा इतिकाफ किया और सहाबा (रज़ि0) ने इतिकाफ किया। इतिकाफ के लिए 20 रमज़ान के मग्रिब की नमाज़ से पहले ही मस्जिद में दाखिल होंगे और ईदुल फित्र का चाँद देखने के बाद मस्जिद से निकला जाएगा।

मानव अपने सम्पूर्ण प्रकार के सम्बंध को समाप्त कर के अपने सम्पूर्ण प्रकार के सम्बंध को अपने सृष्टिकर्ता से जोड़ लेने का नाम इतिकाफ है। इतिकाफ की नियत से मस्जिद में दाखिल होने के बाद केवल अनिवार्य ज़रूरत के कारण मस्जिद से इतिकाफ करने वाला निकल सकता है।

शबे क़द्र:

रमज़ान महीने में एक रात ऐसी भी आती है, जो हज़ार महीने की रात से बेहतर है। जिसे शबे क़द्र कहा जाता है। शबे क़द्र का अर्थ होता हैः ” सर्वश्रेष्ट रात “, ऊंचे स्थान वाली रात”, लोगों के नसीब लिखी जानी वाली रात।

शबे क़द्र बहुत ही महत्वपूर्ण रात है, जिस के एक रात की इबादत हज़ार महीनों (83 वर्ष 4 महीने) की इबादतों से बेहतर और अच्छा है। इसी लिए इस रात की फज़ीलत क़ुरआन मजीद और प्रिय रसूल मुहम्मद ( सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ) की हदीसों से प्रमाणित है।

अल्लाह हमें और आप को इस महीने में ज्यादा से ज़्यादा भलाइ के काम, लोगों के कल्याण के काम, अल्लाह की पुजा तथा अराधना की शक्ति प्रदान करे और हमारे गुनाहों, पापों, गलतियों को अपने दया तथा कृपा से क्षमा करे।   आमीन…………

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