कुरआन क्या है ?

ईसाइयों के क्रसमिस के त्योहार में भाग लेना

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गैर मुस्लिमों के त्यौहारों और धार्मिक उत्सव में भाग लेना अवैध है। या उन की उस कार्य में सहायाता करना भी हराम होगा। अल्लाह तआला ने मुसलमानों को सीधा रास्ते पर चलने की ओर मार्गदर्शन किया है और गैर मुस्लिमों के रास्ते से दूर रहने की दुआ करने का शिक्षण दिया है जैसा कि अल्लाह तआला का फरमान है। “हमें सीधे मार्ग पर चला (6) उन लोगों के मार्ग पर जो तेरे कृपापात्र हुए, जो न प्रकोप के भागी हुए और न पथभ्रष्ट ” ( सूरः फातिहाः 6-7)

जैसा कि हदीस से प्रमाणित है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने “प्रकोप के भागी हुए” से अर्थात यहूदी समुदाय और “ पथभ्रष्ट ” से अर्थात ईसाई बयान फरमाया है।

इसी प्रकार अल्लाह तआला ने यहूदु और क्रस्चयन (ईसाई) से मित्रता और गहरा सम्बन्ध बनाने से मना फरमाया है। जैसा कि अल्लाह तआला ने फरमायाः “ ऐ ईमान लानेवालो! तुम यहूदियों और ईसाइयों को अपना मित्र (राज़दार) न बनाओ। वे (तुम्हारे विरुद्ध) परस्पर एक-दूसरे के मित्र है। तुम में से जो कोई उनको अपना मित्र  बनाएगा, वह उन्हीं लोगों में से होगा। निस्संदेह अल्लाह अत्याचारियों को मार्ग नहीं दिखाता ” (सूरः माईदाः 51)

रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लाम) का फरमान है : “जिस व्यक्ति ने किसी दुसरे समुदाय (जाति) की सदृश अपनाई, तो वह उन्हीं में से है।”  (अबू दाऊदः हदीस संख्याः 4031) तथा अल्बानी ने इर्वाउल गलील (5/109) में सही कहा है।)

यह हदीस साफ तौर पर किसी भी समुदाय के धार्मिक रिति रेवाज को एपनाने से मना करता है और उस रितिरेवाज को स्वीकार कर्ता उसी समुदाय में से माना जाएगा।

जब रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लाम) मक्का से हिज्रत कर के मदीना तशरीफ लाए तो मदीनावासियों को दो प्रकार के उत्सव आयोजित करते हुए पाया जैसा कि अनस बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अन्हा) कहते हैं कि जब रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लाम) हिजरत कर के मदीना आए तो मदीना वासी वर्ष में दो दिन दो प्रकार के खेल कूद मनाते थे तो रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लाम) ने फरमायाः यह कैसा दो दिन है ?, तो लोगों ने कहा कि यह दो दिनों में हम कुफ्र के दिनों में खेल कुदा और मौज मस्ती करते थे तो रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लाम) ने फरमायाः बेशक अल्लाह ने इन दो दिनों के बदले तुम्हें दो उत्तम दिनों में परिवर्तन कर दिया है, ईदुल्फित्र और ईदुल्अज़्हा के दिन है। (अबू दाऊदः 1134, नसईः 1556, मुस्नद अहमदः 1241)

गौयकि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लाम) ने गैर मुस्लिमों के उत्सव से मुसलमानों को सुरक्षित करते हुए इस्लामिक ईद में बदल दिया और मुसलमान उनके त्यौहार और धार्मिक जमघटा में भागिदार न बने।

रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लाम) ने बहुत से अवसर पर यहूदियों और ईसाइयों की मुखालफत और मतभेद रखने पर उत्साहित किया है और ईबादात और रितिरेवाज में विभिन्नता करने पर उभारा है।

निम्न की कुछ हदीसों पर विचार करें।

रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लाम) ने फरमायाः “ बेशक यहूदियों तथा ईसाइयों बाल में मेहदी नहीं लगाते तो तुम उनकी विभिन्नता करते हुए मेंहदी लगाओ। (सही बुख़ारीः 3275, सही मुस्लिमः 2103)

रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लाम) ने फरमायाः गैर मुस्लिमों की मुखालफत करते हुए मोंछ काटो और दाढ़ी बड़ा करो।  (सही बुख़ारीः 5553, सही मुस्लिमः 259)

इब्ने अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णन है कि जब रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लाम) मदीना आए तो आप ने आशूरा का रोज़ा रखा और सहाबा को रोज़ा रखने का आदेश दिया तो सहाबा ने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लाम) यहूदी और ईसाई इस दिन की बहुत आदर तथा सम्मान करते हैं तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लाम) ने फरमायाः इनशा अल्लाह अगले वर्ष हम नौ ज़िल्हिज्जा को भी रोज़ा रखेंगे। …… (सही मुस्लिमः 1134)

दुसरी रिवायत में है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लाम) ने फरमायाः आशूरा का रोज़ा रखो और इस में यहूदियों की मुखालफत करो और आशूरा के साथ एक दिन पहले या एक दिन बाद रोज़ा रखो। (मुस्नद अहमदः 2155)

जब रोज़ा रखने में यहूदियों की रितिरेवाज का उल्लंघन करने का आदेश दिया गया है। तो उन लोगों की जो धार्मिक इबादत या धार्मिक सदृश है तो उस में विभिन्नता करना अनिवार्य होगा और ऐसे सभावों में भाग लेना या सहायता करना अवैध होगा और अपने पत्नियों ,बच्चों , रिश्तेदारों और सम्बन्धियों को उस में भाग लेने से मना करना अनिवार्य होगा जैसा कि अल्लाह तआला ने अपने पत्नियों ,बच्चों, रिश्तेदारों और सम्बन्धियों को जहन्नम के आग से सुरक्षित करने का आदेश दिया है।

﴿ يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا قُوا أَنْفُسَكُمْ وَأَهْلِيكُمْ نَاراً وَقُودُهَا النَّاسُ وَالْحِجَارَةُ عَلَيْهَا مَلائِكَةٌ غِلاظٌ شِدَادٌ لا يَعْصُونَ اللَّهَ مَا أَمَرَهُمْ وَيَفْعَلُونَ مَا يُؤْمَرُونَ ﴾ [التحريم: 6]

“ऐ ईमान वालो! तुम अपने आप को और अपने परिवार वालों को उस आग से बचाओ जिस का ईंधन इंसान हैं और पत्थर, जिस पर कठोर दिल वाले सख्त फरिश्ते नियुक्त हैं, जिन्हें अल्लाह तआला जो हुक्म देता है उसकी अवहेलना नहीं करते बल्कि जो हुक्म दिया जाए उसका पालन करते हैं।” (सूरतुत्तहरीम : 6)

नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लाम) ने फरमाया : “ सावधान! तुम सब के सब जिम्मेदार हो और तुम सब से अपनी जिम्मेदारी के बारे में पूछा जायेगा, अतः लोगों का अमीर निगरां और निरीक्षक है और उससे उसकी प्रजा के बारे में पूछा जायेगा, आदमी अपने घर वालों का ज़िम्मेदार है और उससे उनके बारे में पूछा जायेगा, औरत अपने पति के घर और उसकी औलाद का निरीक्षक है और उस से उनके बारे में पूछताछ होगी, गुलाम (दास) अपने स्वामी के माल का निरीक्षक है और उस से उसके प्रति प्रश्न किया जायेगा, सुनो! तुम सब के सब निरीक्षक हो और प्रत्येक से उसकी प्रजा (अधीनस्थ) के बारे में पूछा जायेगा।” (सही बुखारीः 7138) और मुस्लिमः 1829)

इब्नुल क़ैयिम (रहिमहुल्लाह) कहते हैं: विद्वानों की सर्वसहमति के साथ मुसलमानों के लिए मुश्रेकीन (अनेकेश्वरवादियों) के त्योहारों में उपस्थित होना जाइज़ नहीं है। तथा चारों मतों के अनुयायी फुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने अपनी पुस्कतकों में इसको स्पष्ट रूप से वर्णन किया है … तथा बैहक़ी ने सहीह इसनाद के साथ उमर बिन खत्ताब (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा : “मुश्रेकीन के त्योहारों में उनके चर्चों में उनके पास न जाओ, क्योंकि उन पर अल्लाह का क्रोध बरसता है।” तथा उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) यह भी फरमाया : ” अल्लाह के दुश्मनों से उनके त्योहारों में दूर रहो।”

तथा बैहक़ी ने अच्छी सनद के साथ अब्दुल्लाह बिन अम्र (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा: ” जो आदमी गैर अरब के देशों से गुज़रा, फिर उनके नीरोज़ और महरजान को किया और उनकी समानता अपनाई यहाँ तक कि उसकी मृत्यु हो गई और वह उसी तरह था तो वह क़ियामत के दिन उन्हीं लोगों के साथ उठाया जायेगा।”  (अहकामो अह्लिज़्ज़म्मा (1/723-724)

किस स्थिति में गैर मुस्लिमों से सदृश अपना सकते हैं जिस का धार्मिक इबादत से सम्बन्ध न हो।

इब्ने तैमिया (रहिमहुल्लाह) एक धार्मिक शास्त्र कहते हैं कि यदि कोई मुस्लिम किसी गैर मुस्लिम देश में रहते हैं और जाहरी कार्यों में मुखालफत करने का आदेश नहीं है क्यों कि इस से उन्हें हानि का पहुंचने का डर है और कोई इस्लामिक कारण हो तो उस में भाग लेना अनिवार्य है, जैसे इस्लाम धार्म की दावत उन्हें पहुंचाना हो या उन्हें इस्लाम धर्म की गुन की स्पष्ठकरण करना हो, या मुसलमानों से किसी भारी घाटा और नुक्सान को दूर करना हो,, (इक्तेजाउस्सेरातुल मुस्तक़ीमः 419/1)

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