कुरआन क्या है ?

फ़र्ज़ नमाज़ों की संख्या और उसके पढ़ने का समय

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अल्लाह तआला ने मुसलमानों पर दिन और रात में पांच नमाज़ें अनिवार्य किया है जिसका बयान संक्षिप्त में किया जा रहा है।

पांचों नमाज़ों के पढ़ने का नियुक्त समय है जो आरम्भिक और अन्तिम समय पर आधारित है। जैसा कि अल्लाह तआला का कथन है।

इस आयत का अर्थः “ बेशक नमाज़ वास्तव में ऐसा फ़र्ज़ है जो समय की पाबन्दी के साथ ईमानवालों के लिए अनिवार्य किया गया है।”   (सूरः अन-निसाः 103)

 1.  फ़जर की नमाज़ः

  • सुबह सादिक़ से इस का समय आरम्भ होता है।
  • सूर्य के उदय होने से पहले पहले तक फ़जर की नमाज़ का समय रहता है।

2. ज़ुहर की नमाज़ः

  • सूर्य का केन्द्रय आकाश से पच्छिम की ओर ढ़लने के बाद से ज़ुहर का समय आरम्भ होता है।
  • प्रत्येक वस्तु का छाया, उस के बराबर होने तक ज़ुहर की नमाज़ का अन्तिम समय रहता है।

रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमायाः “ जब सूर्य पच्छिम की ओर ढ़ल जाए तो ज़ुहर का समय आरंभ होता है और जब तक आदमी का छाया उस के लम्बाई के बराबर न हो जाए और अस़्र का समय आरंभ न हो जाए।”   (सही मुस्लिमः 612)

3. अस़्र की नमाज़ः

  • ज़ुहर की नमाज़ का समय समाप्त होने के बाद अस़्र की नमाज़ का प्रथम समय आरंभ होता है।
  • सूर्य के पच्छिम में डूबने के बाद समाप्त होता है।

रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः “ जिसने सूर्य के डूबने से पूर्व अस़्र की एक रक्अत नमाज़ पढ़ने का समय पा लिया तो उस ने अस़्र को पा लिया।”    (बुख़ारीः 554 , मुस्लिमः 618)

मकरूह (अप्रिय)- अस़्र की नमाज़ के प्रियतम समय से विलंब करने से मकरूह (अप्रिय) समय में दाख़िल हो जाता है जब प्रत्येक वस्तु का छाया उस से दुगना से अधिक हो जाए, जैसा कि ह़दीस़ में रसूल ने फ़रमाया है। “ अस़्र का समय जब तक कि घाम में पीलापन न आ जाए और …….. ” (मुस्लिमः 612)

4- मग़्रिब की नमाज़ः

  • सूर्य के पच्छिम में डूबने के बाद से इस का समय आरम्भ होता है।
  • पच्छिम के क्षितिज में लालपन के समाप्त हो।

जैसाकि ह़दीस़ में रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया है। “ मग़्रिब की नमाज़ का समय पच्छिम के क्षितिज में लालपन के डूबने तक रहता है।”    (मुस्लिमः 612)

5- ईशा की नमाज़ः

  • मग़्रिब की नमाज़ का समय समाप्त होने के बाद ईशा की नमाज़ का समय आरम्भ होता है।
  • सुबह सादिक़ के उदय होने से पहले तक ईशा की नमाज़ का समय रहता है परन्तु उत्तम यह है कि एक तेहाई रात से अधिक विलंब न किया जाए।

फ़जर सादिक़ से अर्थात यह कि पूरब की ओर क्षितिज में प्रकाशन फैल जाए और फिर यह प्रकाशन धीरे धीरे आकाश की ओर फैलता रहे यहाँ तक सूर्य पूरी तरह से उदय हो जाए।

जैसा कि अबू क़तादा से वर्णन है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः “ निंद के कारण पाप नहीं है पाप तो उस समय होता है जब आदमी नमाज़ को विलंब करता रहे यहां तक दुसरी नमाज़ का समय आजाए।”   (मुस्लिमः 681)

यह ह़दीस़ इस बात को प्रमाणित करता है कि एक नमाज़ का समय उस समय तक रहता है जब तुसरे नमाज़ का समय आरंभ न हो जाए।

यह पांचों नामाज़ों का समय हैं, परन्तु एक मुस्लिम को शोभा नहीं देता कि वह अपनी नमाज़ को दुसरी नमाज़ के समय के आरंभ होने तक विलंब करे, प्रायः कभी नमाज़ ही छोड़ दे, बल्कि प्रत्येक नमाज़ को उसके प्राथमिक समय में पढ़ना उत्तम हैऔर ह़दीस़ से प्राथमिक समय मे पढ़ने की पुष्टी होती है। “ नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से प्रश्न किया गया कि सब से पुण्य कार्य क्या है ? तो आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उत्तर दिया कि नमाज़ को उस के समय में पढ़ना, अर्थात उस के प्रथम समय में अदा करना।”   (बुखारीः 504)

रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः “ जिसने सूर्य के उदय होने से पूर्व फ़जर की एक रक्अत नमाज़ पढ़ने का समय पा लिया तो उस ने फ़जर की नमाज़ को पा लिया और जिसने सूर्य के डूबने से पूर्व अस़्र की एक रक्अत नमाज़ पढ़ने का समय पा लिया तो उस ने अस़्र की नमाज़ को पा लिया।”    (बुख़ारीः 554, मुस्लिमः 618)

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