कुरआन क्या है ?

कुरआन करीम की तिलावत का महत्व

कुरआन करीम की तिलावत करने के लाभ

कुरआन करीम की तिलावत करने के लाभ

 

क़ुरआन करीम अल्लाह का ग्रन्थ है। जिसे अल्लाह तआला ने अपने संदेष्टा मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर 23 वर्ष की अवधि में आवश्यकता के अनुसार जिबरील के माध्यम से अवतरित किया है।

नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के सत्य संदेष्टा को प्रमाणित करने के तौर पर क़ुरआन करीम एक बहुत ही महान चमत्कार के रूप में है और क़ियामत तक के लिए पूरे मानव और जिन्नों को उस जैसा क़ुरआन या उस के जैसा दस आयतें लाने कीचुनौती दी गइ है। क़ुरआन सारे मानव का सही मार्गदर्शक है। क़ुरआन करीम को वैसे ही समझा जाए, जैसा कि नबी (सल्ल) ने अपने साथियों को समझया और सहाबा किराम (रज़ि0) ने अपने छात्र को समझाया। क़ुरआन करीम पढ़ने से बहुत लाभ प्राप्त होते हैं और नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने क़ुरआन पढ़ने पर बहुत ज़्यादा उत्साहित किया है।

क़ुरआन करीम का सम्बन्ध रमज़ान मुबारक से बहुत ज़्यादा और बहुत ही गहरा है। क्योंकि रमज़ान के महीने में ही क़रआन नबी (सल्ल0) पर अवतरित होना आरम्भ हुवा और फरिश्ते जिबरील प्रत्येक रमज़ान में नबी (सल्ल0) के पास तशरीफ लाते थे और क़ुरआन करीम का दौरा करवाते थे। इस लिए कुरआन करीम की तिलावत करने के लाभ बहुत ज़्यादा हैं। जिन में कुछ  महत्वपूर्ण लाभ का वर्णन किया जाता है।

 क़ुरआन करीम के कुछ महत्वपूर्ण लाभ निम्न में बयान किये जाते हैं।

 

 1- क़ुरआन का सिक्षा लेने वाले और शिक्षा देने वाले सर्वेत्म लोग हैं।

नबी(सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने क़रआन पढ़ने वाले और क़ुरआन पढ़ाने वाले की फज़ीलत बयान फरमाया है। जैसा कि नबी का (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) फरमान हैः

عن عثمان رضي الله عنه عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: خيركم من تعلم القرآن وعلمه. (البخاري: 5027

उस्मान (रज़ि) से वर्णन है कि नबी(सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः तुम में सब से अच्छा वह है, जो क़ुरआन का शिक्षा लेता और क़ुरआन का शिक्षा देता है।(सही बुखारीः 5027)

जो लोग भी क़ुरआन पढ़ते हैं और क़ुरआन पर गम्भीरता से विचार करते हैं और क़ुरआन के अनुसार जीवन व्यतीत करते हैं। तो ऐसे लोग ही सब से अच्छे और सफलपूर्वक हैं।

2-  क़ुरआन पढ़ने वालों की उदाहरणः

क़ुरआन करीम पढ़ने वाले की सर्वश्रेष्टा को नबी (सल्ल0) ने एक उत्तम उदाहरण से स्पष्ट किया है। जैसा किरसूल(सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने क़ुरआन पढ़ने वालों मूमिन की उदाहरण इस प्रकार दिया हैः

عن أبي موسى الأشعري قال: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم: مثل المؤمن الذي يقرأ القرآن مثل الأترجة، ريحها طيب، وطعمها طيب، ومثل المؤمن الذي لا يقرأ القرآن مثل التمرة لا ريح لها، وطعمها حلو، ومثل المنافق الذي لا يقرأ القرآن كمثل الحنظلة: ليس لها ريح وطعمها مر.  (مسلم: 1860

अबू मूसा अल्अशअरी (रज़ि) से वर्णन है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः क़ुरआन पढ़ने वाले मूमिन की उदाहरण गागर लेंबू की तरह है। जिस की सुगंध बहुत अच्छी है और उस का स्वाद भी बहुत अच्छा है। क़ुरआन न पढ़ने वाले मूमिन की उदाहरण खुजूर की तरह है जिस में सुगंध नहीं है और उसका स्वाद बहुत मीठा है और क़ुरआन न पढ़ने वाले मुनाफिक की उदाहरण कड़वे फल की तरह है जिस में सुगंध नहीं और उसका स्वाद बहुत ही कड़वा है। (सही मुस्लिमः 1860)

3-  क़ुरआन की मधूर स्वर में अच्छी तिलावत करने वालों से रश्क किया जा सकता हैः

अल्लाह तआला ने हसद और रश्क करने को वर्जित किया है। परन्तु जो लोग क़ुरआन बहुत अच्छा पढ़ते हैं तो ऐसे लोगों के से रशक किया जाता सकता है। जबकि इनके अलावा लोगों से रश्क करना पाप है। जैसा कि नबी(सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने सूचित किया हैः

عن عبد الله بن عمر عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: لا حسد إلا في اثنتين: رجل آتاه الله القرآن، فهو يقوم به آناء الليل، وآناء النهار، ورجل آتاه الله مالاً فهو ينفقه، آناء الليل، وآناء النهار. (مسلم: 1862)

अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ि) से वर्णन है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का प्रवचन हैः दो वस्तुओं के अलावा में हसद जाइज़ नहीं है। एक व्यक्ति को अल्लाह ने मधूर स्वर में क़ुरआन पढ़ने की क्षमता दी है, तो वह दिन और रात में क़ुरआन की तिलावत करता है, और दुसरा व्यक्ति को अल्लाह ने माल-दौलत प्रदान की है, तो वह दिनों और रातों में अपने धन-दौलत को अल्लाह की प्रसन्नता में खर्च करता है। (सही मुस्लिमः 1862)

4-  क़ुरआन करीम को बहुत ही उत्तम रूप से पढ़ने वाला बहुत आदर्नीय नेक फरिश्तों के साथ होगाः

क़ुरआन अल्लाह का कलाम है। जिस का पढ़ना और पढ़ाना बहुत पूण्य का कार्य है। जो लोग इस के याद करने और उसका शिक्षा प्राप्त करने में बहुत ज़्यादा प्रयास और जतन करते हैं और फिर क़ुरआन पढ़ने में माहिर और विशेषज्ञ हो जाते हैं और क़ुरआन के माहिर होने में अल्लाह की खुशी का लक्ष्य रखते हैं और दिखलावा से दूर होते हैं। तो ऐसे लोगों के लिए बहुत ही खुशखबरी है। जैसा कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का कथन हैः

   وعن عائشة رضي الله عنها قالت: قال رسول الله صلى الله عليه وسلم:  الماهر بالقرآن مع السفرة الكرام البررة، والذي يقرأ القرآن ويتتعتع فيه، وهو عليه شاق، له أجران. (مسلم: 1962

आईशा (रज़ि0) से वर्णन है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः क़ुरआन का विशेषज्ञ बहुत आदर्नीय नेक फरिश्तों के साथ होगा और जो व्यक्ति क़ुरआन पढ़ता है और क़ुरआन के पढ़ने में हकलाता है और बहुत कठिनाइ का अनुभव करता है, तो उस के लिए दो बदला है। (सही मुस्लिमः 1962)

जिस प्रकार आदर्नीय नेक फरिश्तों का स्थान अल्लाह के पास बहुत ही उच्च हैं। इसी प्रकार क़ुरआन के माहिर लोगों का स्थान अल्लाह के पास बहुत ऊंचा और उत्तम है।

5-  क़ुरआन और रोज़ा शिफारिस करेंगेः

रमाज़ान महीने का क़ुरआन करीम के साथ विशेष सम्बंध है। क़ुरआन करीम रमज़ान के मुबारक महीने में ही अवतरित हुआ और क़ियामत के दिन क़ुरआन अपने पढ़ने वाले और रोज़ा रोज़ेदार के लिए शिफारिस करेंगे। उस दिन जिस दिन प्रत्येक व्यक्ति परेशान और पीड़ा में होगा, किसी का कोइ सहायक न होगा, उस नाज़ुक स्थिति में क़ुरआन अपने पढ़ने वाले और रोज़ा रोज़ेदार के लिए अल्लाह से विशेष शिफारिस करेंगे और अल्लाह तआला उन दोनों की शिफारिस को स्वीकार भी करेगा। जैसा किनबी(सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने शुभ सूचना दिया हैः

عن عبدالله بن عمروأن النبي صلى الله عليه وسلم قال: الصيام والقرآن يشفعان للعبد يوم القيامة، يقول الصيام أي رب منعته الطعام والشهوات بالنهار فشفعنى فيه. ويقول القرآن منعته النوم بالليل، فشفعنى فيه فيشفعان.   (رواهأحمد: 10/118وصحيحالجامع: 3882

अब्दुल्लाह बिन अम्र (रज़ि) से वर्णन है कि रसूल (सल्ल) ने फरमायाः रोज़ा और क़ुरआन कियामत के दिन अपने अमलकर्ता के लिए शिफारिस करेंगे। रोजा कहेगाः “ ऐ रब्ब! मैं ने उसे दिन में खाने और पीने से रोके रखा, तो मेरी शिफारिस उसके प्रति स्वीकार कर ले, और क़ुरआन कहेगाः मैं ने उसे रात में निन्द का मज़ा लेने से रोके रखा, तो उस के प्रति मेरी शिफारिस स्वीकार कर, तो उन दोनों की शिफारिस स्वीकारित होगी। (मुस्नद अहमदः 10/118, व सही अल-जामिअः 3882)

6-  क़ुरआन की कुछ आयत पढ़ने के बाद जो दुआ मांगी जाती है, तो वह दुआ स्वीकारित होती हैः

अल्लाह तआला ने क़ुरआन पढ़ने वालों को विभिन्न प्रकार से पुरस्करा देने और सम्मानित करने का वादा किया है। जैसा कि नबी (सल्ल0) ने सूरह फातिहा और सूरह बकरा की अन्तिम आयत के प्रति फरमायाः

عن ابن عباس قال: بينا جبريل قاعد عند النبي صلى الله عليه وسلم: سمع نقيضا من فوقه، فرفع رأسه، فقال: هذا باب من السماء فتح اليوم، لم يفتح قط إلا يوم، فنزل منه ملك فقال: هذا ملك نزل إلى الأرض، لم ينزل قط إلا اليوم، فسلّم وقال: أبشر بنورين أوتيتهما لم يؤتهما نبي قبلك: فاتحة الكتاب، وخواتيم سورة البقرة، لن تقرأ بحرف منهما إلا أعطيته.    (مسلم: 1877

इब्ने अब्बास (रज़ि) से वर्णन है कि जिब्रील (अलैहि) नबी(सल्ल) के पास बैठे थे, तो ऊपर से एक आवाज सुनाइ पड़ी, तो उन्हों ने अपना सर ऊपर उठाया, तो कहाः आज ही आकाश का यह दरवाज़ा खुला है। आज के सिवा यह दरवाज़ा कभी भी न खोला गया, तो उस से एक फरिश्ता उतरा तो उन्हों ने कहाः यह फरिश्ता धरती पर प्रथम पर उतरा है और इस से पहले कभी भी न उतराः तो उस फरिश्ते ने सलाम किया और कहाः मैं आप को दो रोशनी की शुभ खबर देता हूँ, जिन्हें आप से पूर्व नबियों को नहीं दिया गया, सूरह फातिहा और सूरह बक्रा की अन्तिम आयत, इन दोनों आयतों में से एक अक्षर भी पढ़ने के बाद दुआ स्वीकारित होती है।

7-  सूरह बकरा पढ़ने से जादू का असर नहीं होता हैः

क़ुरआन में अल्लाह ने आत्मा और शरीर दोनों के लिए शिफा रखा है। क़ुरआन की तिलावत करने से मानव के नफ्स का प्रशिक्षण होता है। क़ुरआन मानव की आत्मा को शुद्धता प्रदान करता है। मानव के जहन को कुफ्र और शिर्क से सुरक्षित रखता है और मानव को शरीर को विभिन्न प्रकार के रोगों से सुरक्षित रखता है। जैसा कि

रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का कथन हैः

وعن أبو أمامه الباهلي قال: سمعت رسول الله صلى الله عليه وسلم يقول: اقرؤوا القرآن، فإنه يأتي يوم القيامة شفيعا لأصحابه، اقرؤوا الزهراوين: البقرة وسورة آل عمران، فإنهما يأتيان يوم القيامة كأنهما غمامتان، أو كأنهما غيايتان، أو كأنهما فرقان من طير صواف، تحاجان عن أصحابهما، اقرؤوا سورة البقرة، فإن أخذها بركة، وتركها حسرة، ولا يستطيعها البطلة. (مسلم: 1874

अबू उमामा अल्बाहली (रज़ि) से वर्णन है कि मैं ने रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को फरमाते हुए सुनाः क़ुरआन पढ़ो, बेशक क़ुरआन क़ियामत के दिन अपने पढ़ने वालों के लिए शिफारिस करेगा, ज़ह्रावैन की तिलावत करो, वह सूरह अल्बक्रा और सूरह आले इम्रान है। क़ियामत के दिन यह दोनों बादल के रूप में आऐंगे। या दोनों बादल के रूप में साया किये होंगे या पंक्षियों के दो झुंड के रूप में आऐंगे। दोनों अपने पढ़ने वालों के लिए शिफारिस करेंगे। तो सूरह अल्बक्रा पढ़ो, तो उस का पढ़ना बरकत है और उसका छोड़ना शोक है और जादूगर उस से लड़ने की क्षमता नहीं रखते हैं। (सही मुस्लिमः 1874)

8-  सूरह अल-कहफ की प्रथम दस दस आयत दज्जाल के फित्ने से सुरक्षित रखेगाः

जैसा कि नबी (सल्ल0) ने सूरह अल्कहफ के प्रथम दस आयतों के प्रति फरमायाः

عن أبي الدرداء أن النبي صلى الله عليه وسلم قال: من حفظ عشر آيات من أول سورة الكهف،عصم من فتنة الدجل. (مسلم: 1883

अबू दर्दा (रज़ि0) से वर्णन है कि रसूल(सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः जिस ने सूरह अल्कहफ के प्रथम दस आयतें याद किया, तो वह दज्जाल के फित्ने से सुरक्षित रहेगा। (सही मुस्लिमः 1883)

9-  सूरह इख्लास एक तेहाइ क़ुरआन के बराबर हैः

क़ुरआन की बरकत में से है कि अल्लाह तआला ने क़ुरआन के कुछ सूरतों को बहुत उच्च स्थान प्रदान किया है और उस के पढ़ने से कम मेहनत में ज़्यादा पूण्य प्राप्त होता है।जैसा कि नबी (सल्ल0) ने सूरह इख्लास के प्रति फरमायाः

عن أبي الدرداء عن النبي صلى الله عليه وسلم قال: أيعجز أحدكم أن يقرأ في ليلة ثلث القرآن؟ قالوا: وكيف يقرأ ثلث القرآن؟ قال: قُلْ هُوَ اللَّهُ أَحَدٌ، تعدل ثلث القرآن. (مسلم: 1886

अबू दर्दा (रज़ि0) से वर्णन है कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाःक्या तुम में से कोइ एक रात में एक तेहाइ क़ुरआन पढ़ सकता है ?, तो लोगों ने कहाः एक रात में कैसे एक तेहाइ क़ुरआन पढ़ा जा सकता है?, फिर आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः क़ुल-हुवल्लाहु अहद, एक तेहाइ क़ुरआन के बराबर है।   (सही मुस्लिमः 1886)

 10-  अल्लाह तआला क़ुरआन के कारण समुदाय के आदर-सम्मान को बढ़ाता हैः

क़ुरआन करीम पर अमल करने के कारण अल्लाह लोगों के आदर-सम्मान और पद को ऊंचा करता है औ जो लोग क़ुरआन पर अमल नहीं करते हैं, ऐसे लोगों को ज़लील और अपमान करता है। जैसा कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः

قال عمر: أما إن نبيكم صلى الله عليه وسلم قد قال: إن الله يرفع بهذا الكتاب أقواما، ويضع به آخرين. (مسلم: 1897

उमर (रज़ि0) ने फरमायाः बेशक तुम्हारे नबी (सल्ल0) ने फरमयाः बेशक अल्लाह इस किताब (क़ुरआन) के माध्यम से कुछ समुदाय के स्थान को बढ़ाता है और कुछ दुसरे लोगों के स्थान को निचा करता है। (सही मुस्लिमः 1897)

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