कुरआन क्या है ?

क्या क़ुरआन मानव रचित ग्रन्थ है ?

500डा. जी डबल्यू लिड्ज़ कहते हैः

“प्रायः कहा जाता है कि पवित्र क़ुरआन के लेखक मुहम्मद सल्ल. हैं और उस में जो भी बातें हैं तौरात और ईंजील से ली गई हैं, यह ग़लत है, मेरा विश्वास है कि क़ुरआन ईश-वाणी है “।

प्रिय मित्र! यदि आप निम्नलिखित तथ्यों पर चिंचन मनन करेंगे तो स्वयं आप क़ुरआन को ईश्वर की वाणी मानने पर विवश होंगेः

(1) क़ुरआन की भाषा शैली:

क़ुरआन का सब से महान चमत्कार यह है कि इसकी शैली मानव शैली से सर्वथा भिन्न है। वह अरब जिन में क़ुरआन का अवतरण हुआ था अपने शुद्ध साहित्यिक रसासवादन के लिए अति प्रसिद्ध थे, उनको अपनी भाषा शैली पर बड़ा गर्व था। ऐसे लोगों को क़ुरआन ने चुनौति दी –

” और यदि उसके विषय में जो हमने अपने बन्दे पर उतारा है, तुम किसी संदेह में हो तो उस जैसी कोई सूरः ले आओ और अल्लाह से हट कर अपने सहायकों को बुला लो जिनके आ मौजूद होने पर तुम्हें विश्वास है, यदि तुम सच्चे हो”। ( सूरः 2 आयत 23-24)

लेकिन इतिहास साक्षी है कि पूरे अरब उसके समान एक अध्याय तो क्या एक श्लोक भी पेश करने में असमर्थ्य रहे हालाँकि वह मुहम्मद सल्ल. के विरोद्ध में पूरे साहसी थे और आपत्ति का ओई अवसर खोना नहीं चाहते थे, तथा अरबी भाषा पर भी पूरी महारत रखते थे। यदि कुरआन मानव रचना होता तो कुछ लोग अवश्य उसके समान पेश कर सकते थे परन्तु न कर सके।

यह ग्रन्थ आज तक संसार वालों के लिए चुनौति बना हुआ है तथा रहती दुनिया तक बना रहेगा।

(2) उम्मी नबी पर क़ुरआन का अवरणः

यह भी एक सत्य है कि ईश्वर ने अन्तिम ग्रन्थ क़ुरआन के अवतरण के लिए ऐसे संदेष्टा का चयन किया जो न लिखना जानते थे न पढ़ना। मुहम्मद सल्ल0 के जन्म के पूर्व ही उनके पिता का देहांत हो गया। छः वर्ष की आयु हुई तो माता भी चल बसीं और आठ वर्ष के हुए तो दादा का साया भी सर से उठ गया कारणवश शिक्षा-दिक्षा से वंचित रहे और न ही उन्हें किसी विद्वान की संगति प्राप्त हुई थी आखिर ऐसे व्यक्ति से लिए यह कैसे सम्भव हो सकता था कि वह ऐसी अनुपम साहित्यिक पुस्तुक तैयार कर ले। यह ईश्वर की चाहत थी कि अन्तिम संदेष्टा पढ़े लिखे न हों ताकि कोई उन पर यह आरोप न लगाए कि वह क़ुरआन को अपनी ओर से बना कर अरबों की आखों में धूल झोंक रहे हैं।

आप अशिक्षित ( उम्मी ) होने के बावजूद लोगों में पवित्रता, सच्चाई और अमानतदारी से प्रसिद्ध थे यहाँ तक कि लोगों ने आपको सादिक़ (सच्चा) और अमीन (अमानतदार) की उपाधि से रखी थी। क्या ऐसा व्यक्ति जो लोगों के बीच सच्चाई और अमानदतारी से प्रसिद्ध हो अपनी बात ईश्वर की ओर सम्बन्धित कर सकता है? यह बात बुद्धिसंगत नहीं हो सकती । ज्ञात यह हुआ कि मुहम्मद सल्ल0 का पूरा ज्ञान ईश्वरीय ज्ञान था।

(3) क़ुरआन की शैली और मुहम्मद सल्ल0 की शैली में अन्तरः

मुहम्मद सल्ल0 के प्रवचनों को हदीस कहा जाता है। आपके इन प्रवचनों की शैली और क़ुरआन की शैली दोनों को मिला कर देखें तो दोनों सर्वथा भिन्न देखाई देंगे। कोई भी व्यक्ति जो क़ुरआन और हदीस को पढ़ेगा दो चार वाक्य पढ़ कर ही इस परिणाम पर पहुंच जाएगा कि यह दोनों वाणियाँ किसी एक व्यक्ति की नहीं हो सकतीँ। क्योंकि क़ुरआन का स्वर अत्यन्त मनमोहक है अपितु क़ुरआन की शैली मानव शैली से सर्वथा भिन्न है। यही कारण था कि जब मक्का वाले मुहम्मद सल्ल0 को क़ुरआन पढ़ते हुए सुनते तो आश्चर्यचकित रह जाते थे।
मुहम्मद साहिब का कट्टर शत्रु वलीद बिन मुग़ीरा ने जब आपको क़ुरआन पढ़ते हुए सुना तो बोल पड़ाः ईश्वर की सौगंध! उसमें मिठास है, उसमें ताज़गी और हरापन है (मानो यह ऐसा वृक्ष है ) जिसका निचला भाग छाँव वाला है और ऊपरी भाग फलदार है। यह मानव रचित हो ही नहीं सकता।”हम भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि वह अरब जिनके अन्दर मानवता नाम की कोई चीज़ नहीं थी जब क़ुरआनी शिक्षाओं को ले कर उठे तो थोड़े ही दिनों में चीन की सीमाओं से लेकर फ्रांस तक पहुंच गए और क़ुरआन के आधार पर एक ऐसी संस्कृति की स्थापना की जिस से प्रभावित हो कर गाँधी जी को कहना पड़ाः ” जब हमारा देश स्वतंत्र होगा तो हम उसमें अबू-बक्र तथा ऊमर जैसी शासन लाएंगे।”

(4) क़ुरआन हर प्रकार के विभेदों से मुक्त हैः

मानव कितना बड़ा विद्वान क्यों न हो जाए उस से ग़लतियाँ और कोताहियाँ हाती ही रहती हैं। उसका लेखन और भाषण त्रुटियों से सुरक्षित नहीं रह सकता। ईसी लिए क़ुरआन में एक स्थान पर ईश्वर का कथन हैः क्या यह लोग क़रआन में चिंतन मनन नहीं करते, यदि यह ईश्वर के अतिरिक्त किसी अन्य की ओर से होता तो अवश्य उसमें बहुत कुछ मतभेद पाते।” (सूरः 4 आयत 82)परन्तु क़ुरआन हर प्रकार की ग़लतियों आपत्तियों और कमियों से सुरक्षित है। यदि किसी को क़ुरआन में किसी प्रकार की आपत्ति नज़र आ रही हो तो वास्तव में ऐसा क़ुरआन का ज्ञान न होने के कारण होगा जिसके निवारण हेतु उसे क़ुरआन के विद्वानों से सम्पर्क करना चाहिए। क़ुरआन का आदेश हैः
” यह अत्यन्त महान ग्रन्थ है जिसके पास असत्य फटक भी नहीं सकता, न उसके आगे से, न उसके पीछे से, यह है अवतरित किया हुआ हिकमत वाले तथा गुणों वाले अल्लाह की ओर से” ( सूरः49 आयत 41-42)

कुरआन ने दिलों को जीता

क़ुरआन के ईश्-वाणी होने का एक महत्वपूर्ण प्रमाण उसके अन्दर शुद्ध साहित्यिक रसासवादन का पाया जाना है। जिस किसी ने क़ुरआन को दिल व दिमाग़ लगाकर सुना उस से प्रभावित हुए बिना न रहा। जिस किसी ने उसे मन से पढ़ा उसे दिल दे बैठा। यह कोई काल्पनिक वृत्तांत नहीं अपितु ऐतिहासिक तथ्य है।

वह अरब जिनके बीच क़ुरआन का अवतरण हो रहा था जब वह स्वयं क़ुरआन पढ़ते अथवा सुनते तो विश्वास कर लेते कि यह ग्रन्थ मानव रचित नहीं , ईश्वाणी है।

मुहम्मद साहिब का कट्टर शत्रु वलीद बिन मुग़ीरा ने जब आपको क़ुरआन पढ़ते हुए सुना तो बोल पड़ाः ” ईश्वर की सौगंध! उसमें मिठास है, उसमें ताज़गी और हरापन है (मानो यह ऐसा वृक्ष है ) जिसका निचला भाग छाँव वाला है और ऊपरी भाग फलदार है। यह मानव रचित हो ही नहीं सकता।”बल्कि इतिहास साक्षी है कि कितने लोगों ने क़ुरआन को सुनने के बाद उसके साहित्यिक रसासवादन से प्रभावित हो कर इस्लाम को स्वीकार कर लिया।

तलवार ले कर निकले पर दिल दे बैठेः

उमर बिन खत्ताब ( जो मुहम्मद सल्ल0 के देहांत के पश्चात दूसरे महान शासक हुए) इस्लाम स्वीकार करने से पूर्व मुहम्मद सल्ल0 के कट्टर शत्रु थे। एक दिन तलवार लटकाए इस संकल्प के साथ घर से निकले कि मुहम्मद सल्ल0 का सफाया ही कर दिया जाए ताकि न रहे बाँस न बजे बाँसरी। रास्ते में सूचना मिली के उनकी बहन और बहनोई भी इस्लाम स्वीकार कर चुके हैं। उमर ने सीधे बहन बहनोई का रुख किया। उनके घर पहुंचे और पूछाः क्या तुम दोनों इस्लाम स्वीकार कर चुके हो? -बहनोई ने कहा:अच्छा उमर यह बताओ यदि सत्य तुम्हारे धर्म के बजाए किसी और घर्म में हो तो? उमर का इतना सुनना था कि अपने बहनोई पर चढ़ बैठे और उन्हें बुरी तरह कुचल दिया। उनकी बहन ने पलट कर उन्हें अपने पति से अलग करना चाहा तो बहन को ऐसा चाँटा मारा कि चेहरा खून से लतपत हो गया। बहन ने कहाः उमर तुम से जो बन सकता हो कर लो परन्तु इस्लाम दिल में बैठ चुका है इसे तुम निकाल नहीं सकते। भाई को अपने दोष का एह्सास हुआ उन्हों ने पछताते हुए पूछाः अच्छा यह ग्रन्थ जो तुम्हारे पास है ज़रा मुझे भी पढ़ने का दो। बहन ने कहाः तुम अभी अपवित्र हो, उठो और स्नान करके आओ। उमर ने उठ कर स्नान किया, फिर क़ुरआन ली और पढ़ना शुरू कियाः अनुवादः ईश्वर के नाम से जो अत्यंत दयावान और कृपाशील है। कहने लगेः यह तो बड़े पवित्र नाम हैं। उसके बाद सूरः ताहा पढना शूरू किया जब प्रथम आयत से 14वी आयतः अनुवादः “निःसंदेह मैं ही अल्लाह हूं। मेरे अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं अतः मेरी ही पूजा करो और मेरे लिए ही नमाज़ पढो।” तक पढ़ी। कहने लगेः यह तो बड़ी उत्तम और प्रिय वाणी है मुझे मुहम्मद सल्ल0 का पता बताओ। उमर ने अपनी तलवार लटकाई और उस घर की ओर चले जिसमें रसूल सल्ल0 अपने साथियों के साथ एकत्र होते थे। जब रसूल सल्ल0 को देखा तो पुकार उठेः ” मैं साक्षी हूं कि अल्लाह के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं और में साक्षी हूं कि मुहम्मद सल्ल0 अल्लाह के संदेष्टा हैं।”

शासक की आँखें बहने लगीं:

हब्शा (इथियोपिया) का शासक अस्हमा ईसाई था। जब कुछ मुसलमानों ने मक्का वालों के कठोर व्यवहार से तंग आकर हब्शा में शरण लिया तो वहाँ पर उन लोगों को बादशाह की सेवा में लाया गया। मुसलमानों के अध्यक्ष जाफर (रज़ि0) ने उसके समक्ष सूरः मर्यम की कुछ आयतें पढ़ीं। सुनते ही बादशाह की आँखों से आँसू आ गए। फिर उसके बाद उसने इस्लाम भी स्वीकार कर ली।

क़ुरआन के मधूर भनक ने दिल जीत लियाः

तुफैल बिन अमर अद्दौसी यमन के दौस समुदाय के नायक थे। काबा के दर्शन हेतु मक्का आए को लोगों ने मुहम्मद सल्ल0 के विरोद्ध में उनको इतना भड़काया कि उन्होंने कान में रूई ठूंस ली थी ताकि क़ुरआन की कोई बात कान में न पड़ने पाए। काबा में आए और काबा में रखी 360 मूर्तियों की पूजा करने के बाद एक किनारे में मुहम्मद सल्ल0 को देखा कि आप क़ुरआन का पाठ कर रहे थे। सोचा कि मैं तो बुद्धि-ज्ञान रखता हूं अपने समाज का नायक हूं, सही ग़लम में तमीज़ कर सकता हूं क्यों न मुहम्मद सल्ल0 की बात सुनी जाए, हल्का सा कान से रूई खिस्काया तो ज़रा भनक लगी, निकट हुए तो क़ुरआन के रसासवादन ने उन्हें सुनने पर विवश किया, वह बैठ कर क़ुरआन सुनने लगे। अंततः उन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिय़ा।

क्या यह लोग स्वयं पैदा हो गए हैं

जुबैर बिन मुतईम ने मुहम्मद सल्ल0 को यह आयत पढ़ते हुए सुना – अनुवादः क्या यह लोग स्वयं पैदा हो गए हैं, अथवा वह स्वयं पैदा करने वाले हैं, क्या आकाश और धरती को इन्हीं लोगों ने पैदा किया है।” (सूरः 52 आयत 35) यह सुन कर कहते हैं कि मेरा दिल उड़ने लगा, अंततः मैंने इस्लाम स्वीकार कर ली।

यह मात्र कुछ उदाहरण थे वरना ऐसी हज़ारों मिसालें पाई जाती हैं जिन से ज्ञात होता है कि कुरआन ने दिलों को जीता और उस पर पूर्ण रूप में क़ाबू पाया। यही कुरआन का सब से बड़ा चमत्कार है। आज भी यदि कोई क़ुरआन को समझ कर पढ़ेगा अथवा सुनेगा तो उसके रसासवादन से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता।


कुरआन के संख्यात्मक चमत्कार

क़ुरआन ईश्वर की ओर से अवतरित सम्पूर्ण मानव के लिए एक उत्तम उपहार और रहती दुनिया तक के लिए एक महान चमत्कार है। क़ुरआन स्वयं घोषणा करता हैः “आप कह दीजिए कि यदि प्रत्येक मानव तथा सारे जिन्नात मिल कर इस क़ुरआन के समान लाना चाहें तो उन सब के लिए इसके समान लाना असम्भव है। यधपि वह (परस्पर) एक दूसरे के सहायक भी बन जाएं।” (सूरः बनी इस्राईल 17 आयत 88)

क़ुरआन उस अल्लाह की वाणी है जो संसार का उत्पत्तिकर्ता, शासक और ज्ञानी है। जो लोगों के वर्तमान अतीत और भविष्य का जानने वाला है। क़रआन का चमत्कार रहती दुनिया तक बाक़ी रहेगा।

प्रतिदिन नवीन शौध के आधार पर क़ुरआन से सम्बन्धित अदभूत प्रकार की चमत्कारियाँ हमारे समक्ष प्रकट हो रही हैं। उन चमत्कारियों में से एक कुरआन के शब्दों में संख्यात्मक समानताओं का पाया जाना है जो स्पष्ट प्रमाण हैं कि कुरआन पृथ्वी व आकाश के सृष्टिक्रता की ओर से अवतरित किया हुआ महान ग्रन्थ है।

क़ुरआनी शब्दों में समानताओं और चमत्कारियों का पाया जाना वास्तव में बड़ा आश्चर्यजनक विषय है। मुसलमान विद्वानों ने नवीनतम सांख्यिकीय उपकरण और कंप्यूटर के माध्यम से आज के आधुनिक युग में इस गणितीय चमत्कार को मानव के सामने पेश किया है।

यह चमत्कार संख्या पर आधारित है और आँकड़े स्वयं बालते हैं जिसे न चर्चा का विषय बनाया जा सकता है और न ही इसका इनकार किया जा सकता है। अल्लाह ने चाहा कि शब्दों का यह चमत्कार आज के युग में उदित हो ताकि प्रगतिशिल लोगों के लिए क़ुरआन विश्वास का आधार बने। क़ुरआन कहता हैः ” हम अवश्य उन्हें अपनी निशानियाँ धरती व आकाश में देखाएंगे और स्वयं उनकी अपनी ज़ात में भी यहाँ तक कि उन पर खुल जाए कि सत्य यही है।” ( हा मीम सज्दा 41 आयत 53)

तो लीजिए यह हैं कुछ क़ुरआन के संख्यात्मक आंकड़ेः

क़ुरआन में कुछ शब्द ऐसे हैं जो अपने समान शब्द अथवा अपने से विलोम शब्द के साथ दोहराए गए हैं उदाहरण के लिए देखिएः

हयात (जीवन) 145 बार दोहराया गया है ………. तो मौत 145 बार ही दोहराया गया है।

सालिहात (नेकियाँ) 167 बार दोहराया गया है ……. तोसय्येआत (बुराइयाँ) 167 बार ही दोहराया गया है।
दुनिया 115 बार दोहराया गया है……… तो आखिरत 115 बारही दोहराया गया है।
मलाईकः (स्वर्गदूतों) 88 बार दोहराया गया है ………. तो शैतान88 बार ही दोहराया गया है।
मुहब्बः (प्यार) 83 बार दोहराया गया है………..तो ताअत ( आज्ञाकारिता) 83 बार ही दोहराया गया है।
हुदा (मार्गदर्शन) 79 बार दोहराया गया है ………..तो रहमत(दया) 79 बार ही दोहराया गया है।
शिद्दत (तीव्रता) 102 बार दोहराया गया है ………. तो सब्र (धैर्य)102 बार ही दोहराया गया है।

अस्सलाम (शांति)50 बार दोहराया गया है ………. तो तय्येबात(पाकीज़गियाँ) 50 बार ही दोहराया गया है।

इब्लीस (शैतान) 11 बार दोहराया गया है ……… तो अल्लाह से शरण मांगना 11 बार ही दोहराया गया है।

जहन्नम (नरक) और उसके डेरिवेटिव 77 बार दोहराया गया है ……. तो जन्नत (स्वर्ग) और उसके डेरिवेटिव 77 बार ही दोहराया गया है।

अर्र-जुल (पुरुष) 24 बार दोहराया गया है ……… तो अल-मरअः(स्त्री) 24 बार ही दोहराया गया है।

क़ुरआन में कुछ शब्द ऐसे हैं जिनके बीच संतुलित और सटीक रूप में सांख्यिकिय बराबरी पाई जाती हैः उदाहरण-स्वरूप

साल में 12 महीने होते हैं ………… तो शह्र ( महीना) 12 बार ही दोहराया गया है

साल में 365 दिन होते हैं तो शब्द यौम (दिन) 365 बार ही दोहराया गया है।
अब हमें बताईए कि क़ुरआन के शब्दों की संख्याओं में भी इस प्रकार संतुलन का पाया जाना क्या यह स्पष्ट प्रमाण नहीं कि यह ग्रन्थ मानव रचित नहीं अपितु संसार के सृष्टा की ओर से अवतरित किया हुआ है।
संदर्भ: (1) मोजज़तुल-अरक़ाम वत्तरक़ीम फिल क़ुरआनिल करीम- (पवित्र कुरआन के संख्यात्मक चमत्कार) अब्दुल रज्जाक नौफल – – दारुल-किताब अल-अरबी 1982
(2) अलइजाज़ अल-अददी लिलक़ुरआन अल-करीम (पवित्र कुरआन के संख्यात्मक चमत्कार) : अब्दुल रज्जाक

क़ुरआन और विज्ञान

क़ुरआन के ईश-वाणी होने के लिए यह प्रमाण काफी है कि उसने आज से साढ़े चौदह सौ वर्ष पूर्व उन वैज्ञानिक बातों की भी चर्चा की है जिसकी खोज विज्ञान आज के युग में कर सका है इस प्रकार के विभिन्न वैज्ञानिक तथ्य क़ुरआन में बयान किए गए हैं। “पवित्र क़ुरआम कोई विज्ञान की पुस्तक नहीं है अपितु मार्गदर्शक ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में छ हज़ार से अधिक आयतें हैं उनमें से एक हज़ार से अधिक आयतों का सम्बन्ध विज्ञान से है।” (क़ुरआन और आधुनिक विज्ञान डा0 ज़ाकिर नाइक पृष्ठ 12)
हम निम्म में कुछ प्रमुख उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं:

भ्रूण का विकासः
पवित्र क़ुरआन में मानव भ्रूण के विकास की विभिन्न अवस्थाओं को इस प्रकार बयान किया गया हैः

” हमने इनसान को मिट्टी के सत से बनाया, फिर हमने उसे एक सुरक्षित ठहरने की जगह टपकी हुई बुंद बना कर रखा। फिर हमने उस बूंद को लोथड़ा का रूप दिया। फिर हमने उस लोथड़े को बूटी का रूप दिया। फिर हमने बोटी की हड्डियाँ बनाईँ। फिर हमने उस हड्डियों पर मास चढ़ाया। फिर हमने उसे एक दूसरा ही सर्जन रूप दे कर खड़ा किया।” ( सूरः 23 आयत 12-14)

कनाडा यूनीवर्सिटी के प्रोफेसर मूरे इस आयतों के सम्बन्ध में लिखते हैं:

“अत्यधिक अनुसंधान के पश्चात जो तथ्य हमें क़ुरआन और हदीस से प्राप्त हुए हैं वास्तव में वह बहुत चौंकाने वाले हैं क्योंकि यह तथ्य सातवीं ईसवी के हैं जब भ्रूणकी के बारे में बहुत कम अध्ययन हुआ था। भ्रूण के सम्बन्ध में सब से पहला अनुसंधान जो ऐरिक स्टेट द्वारा टिकन के अण्डे पर किया गया उसमें भी इस अवस्थाओं का बिल्कुल उल्लेख नहीं है।”

इसके बाद प्रोफेसर मूरे ने अपना निष्कर्ष कुछ इस प्रकार दिया हैः

“हमारे लिए स्पष्ट है कि यह तथ्य मुहम्मद सल्ल0 पर अल्लाह की ओर से ही आया है क्योंकि इस (भ्रुणकी) सम्बन्ध की खोज हज़रत मुहम्मद सल्ल0 की मृत्यु के बहुत बाद में हुई। यह हमारे लिए स्पष्ट करता है कि मुहम्मद सल्ल0 अल्लाह के भेजे हुए संदेष्टा हैं।”

( Moore, K.L, The Development Human, 3th Edition, W.B Saunders co. 1982)

यातनाएं खाल को होती हैं शरीर को नहीं:

प्रोफेसर तेगासान ने जब सन्1995 में रियाज़ (सऊदी अरब) में होने वाली सभा में निम्न आयत पर चिन्तन मनन कियाः

” जिन लोगों ने हमारी आयतों का इन्कार किया उन्हें हम जल्द ही आग में जोंकेंगे। जब उनकी खालें पक जाएंगी तो हम उन्हें दूसरी खालों से बदल दिया करेंगे ताकि वह यातनाओं का मज़ा चखते रहें”।

तो अन्त में उन्होंने अपना विचार इन शब्दों में व्यक्त किया :

” मैं विश्वास करता हूं कि क़ुरआन में जो कुछ भी 14-00 वर्ष पूर्व लिखा जा चुका सत्य है जो आज अनेकों वैज्ञानिक स्रोतों द्वारा प्रमाणित किया जा सकता है। चूंकि हज़रत मुहम्मद सल्ल0 पढ़े लिखे न थे अतः वह अल्लाह के संदेष्टा ही हैं और उन्होंने योग्य सृष्टा की ओर से अवतरित ज्ञान को ही समस्त मनुष्यों तक पहुंचाया, वह योग्य सृष्टा अल्लाह ही है। इस लिए लगता है कि वह समय आ गया है कि मैं गवाही देते हुए पढ़ूं: ” ईश्वर के अतिरिक्त कोई सत्य पूज्य नहीं और मुहम्मद सल्ल0 अल्लाह के भेजे हुए (अन्तिम) संदेष्टा हैं।”

यही वह वैज्ञानिक तथ्य था जिस से प्रभावित हो कर उसी समय उन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया।

पहाड़ों की सृष्टि की हिकमतः

विज्ञान ने आधुनिक खोज द्वारा यह सिद्ध किया है कि पहाड़ों की जड़ पृथ्वी के नीचे हैं जो पृथ्वी को डुलकने से बचाता है और पृथ्वी को स्थिर रखने के लिए महत्वपूर्ण भुमिका अदा करता है। इस तथ्य की ओर क़ुरआन ने आज से साढ़े चौदह सौ वर्ष पूर्व संकेत कर दिया थाः “क्या हमने पृथ्वी को बिछौना और पर्वतों को मेख़ नहीं बनाया?” । ( सूरः 78 आयत 6-7) एक दूसरे स्थान पर फरमायाः ” और हमनें ज़मीन में पहाड़ जमा दिए ताकि वह इन्हें ले कर ढुलक न जाए”। ( सूरः 21 आयत 31)

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