कुरआन क्या है ?

चंद्रमा ग्रहण का संदेश

आज हम चाँद ग्रहण के सम्बन्ध में कुछ बात करेंगे, हमारी बात सारे इंसानों के लिए होंगी, उन इंसानों के लिए जो इस धरती पर रहते, पृथ्वी पर चलते, हवा में सांस लेते, आकाश को छत बनाते, सुर्य तथा चंद्रमा की रोशनी से लाभानवित होते हैं. उन सभी भाइयों और बहनों के नाम हमारा एक सन्देश होगा। जी हाँ! एक संदेश। आशा है कि आप हमारी बातें ध्यान पूर्वक पढ़ेंगेः

प्यारे भाइयो! ऊपर वाले अल्लाह ने अपने अस्तित्व के बहुत सारे लक्षण बृह्मांड में फैला रखे हैं। हमें उसकी निशानियों और उसकी उत्पन्न की हुई चीजों, आकाश पृथ्वी, सूर्य चंद्रमा, पहाड़ों और नदियों पर चिंतन मनन करना चाहिए। अल्लाह ने उन चीजों में सन्देश के कई उपकरण रखे हैं। आकाश को ही देखें अल्लाह उन्हें अपनी शक्ति से कैसे रोके हुआ है, उसे गिरने नहीं देता है। फिर उसे कितना मजबूत और ठोस बनाया है कि उस में कहीं छेद नहीं। जरा देखें तो सही कैसे वह सूर्य, चंद्रमा और चमकदार तथा सुंदर सितारों से सजा हुआ है और कैसे अपने अपने निर्धारित किए गए कक्ष में चक्कर लगा रहे हैं? उनकी चाल में न कोई कमी आती है और न वे बाल के बराबर अपने स्थान से हटते हैं। कितना पवित्र और शक्ति-शाली है वह महिमा जो उन्हें चला रहा है।

अल्लाह अपनी महान हिकमत और बड़ी तत्वदर्शिता के अंतर्गत सूर्य और चंद्रमा में ग्रहण लगाता है। यह ग्रहण है क्या? कुछ देर के लिए अल्लाह उन दोनों से उनकी रोशनी छीन लेता है, यही ग्रहण है। यह ग्रहण अल्लाह के आदेश से लगता है। इसके द्वारा अल्लाह अपने बन्दों को डराता और उनके दिलों में भय उत्पन्न करता है, ताकि वे उससे डर कर न्याय की भयावहता को याद करें और अल्लाह के समक्ष झुक जाएं, पशचाताप करें, तौबा और इस्तिग़फार करें।

अल्लाह का आदेश है:

سَنُرِيهِمْ آيَاتِنَا فِي الْآفَاقِ وَفِي أَنفُسِهِمْ حَتَّىٰ يَتَبَيَّنَ لَهُمْ أَنَّهُ الْحَقُّ ۗ أَوَلَمْ يَكْفِ بِرَبِّكَ أَنَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ شَهِيدٌ – سورۃ فصلت: 53 

शीघ्र ही हम उन्हें अपनी निशानियाँ वाह्य क्षेत्रों में दिखाएँगे और स्वयं उनके अपने भीतर भी, यहाँ तक कि उनपर स्पष्टा हो जाएगा कि वह (क़ुरआन) सत्य है। क्या तुम्हारा रब इस दृष्टि, से काफ़ी नहीं कि वह हर चीज़ का साक्षी है।

मेरे भाइयो! अल्लाह ने आकाश और धरती में जो अपनी बेशुमार संकेत बिखेर रखी है अगर हम थोड़ी देर के लिए उन पर विचार करें तो हम सारा टाल-मटोल छोड़कर उस भयानक दिन की तैयारी में जुट जाएं। महाप्रलय के दिन की हौलनाकी हमेशा हमारी आंखों के सामने हो। इंसान जब मरता है तो मानो उसकी क़यामत क़ाइम हो जाती है। अब उसके लिए पश्चाताप करने का मौका बाकी नहीं रह जाता। इस लिए इंसान को चाहिए कि चाँद ग्रहण से स्वयं को सुधारने के लिए पाठ ले। सही हदीस में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह आदेश सुनें:

إن الشمس والقمر آیتان من آیات اللہ لا ینکسفان لموت أحد ولا لحیاتہ ولکن اللہ یخوف بھما عبادہ، فإذا رأیتم شیئا من ذلک فافزعوا إلی ذکر اللہ و إلی الصلاۃ وعجلوا للاستغفار

“निस्संदेह सूर्य और चंद्रमा अल्लाह की निशानियों में से दो निशानी है। इन दोनों को ग्रहण किसी के मरने या पैदा होने से नहीं लगता, बल्कि उनके द्वारा अल्लाह अपने बंदों को डराता है। तो जब तुम उन में से कोई चीज़ देखो तो अल्लाह के ज़िक्र, नमाज़, दुआ और अपने गुनाहों की माफी की ओर दौड़ पड़ो। “

इंसान कैसा नाशुक्रा है कि वह अपने सामने अल्लाह की हजारों निशानियाँ देखता है लेकिन फिर भी उसके नियमों का उल्लंघन करता रहता है। चाँद ग्रहण या सूर्य ग्रहण अल्लाह की निशानियों में से एक निशानी है जिसके द्वारा अल्लाह अपने दासों को डराता है, यह लोगों पर अल्लाह की सजा के नाज़िल होने का कारण बन सकता है।

इस प्रकार अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शिक्षा है कि जब तक सूर्य या चंद्रमा ग्रहण समाप्त न हो जाए तब तक ज़्यादा से ज़्यादा नमाज़ पढ़ते रहें, दुआ करते रहें और दान देते रहें।

ज़रा विचार कीजिए कि ग्रहण सूर्य अथवा चंद्रमा को लगा होता है लेकिन हमारा माथा सूर्य अथवा चंद्रमा के समक्ष नहीं बल्कि उसके पैदा करने वाले के सामने झुक रहा होता है। यह है वह सत्य जिसकी ओर इस्लाम हमारा मार्गदर्शन करता है। क़ुरआन ने कहाः

وَمِنْ آيَاتِهِ اللَّيْلُ وَالنَّهَارُ وَالشَّمْسُ وَالْقَمَرُ ۚ لَا تَسْجُدُوا لِلشَّمْسِ وَلَا لِلْقَمَرِ وَاسْجُدُوا لِلَّـهِ الَّذِي خَلَقَهُنَّ إِن كُنتُمْ إِيَّاهُ تَعْبُدُونَ  – سورة فصلت : 37 

“रात और दिन और सूर्य और चन्द्रमा उसकी निशानियों में से है। तुम न तो सूर्य को सजदा करो और न चन्द्रमा को, बल्कि अल्लाह को सज्दा करो जिसने उन्हें पैदा किया, यदि तुम उसी की पूजा करने वाले हो।” (सूरः फुस्सिलतः 37)

चंद्रमा तथा सूर्य ग्रहण की नमाज़ का तरीका यह है कि दो रकअत अदा की जाए, हर रकअत में दो क़्याम होगा, दो किराअत होगी और दो रुकूअ होगा जबकि सज्दा दो ही होगा। इस तरह दो रकअत में चार रुकूअ और चार सज्दे होंगे। इसका विवरण खुद बुखारी और मुस्लिम में हज़रत आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा से मरवी है। फरमाती हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जीवन में सूर्य ग्रहण हुआ तो आप मस्जिद में तशरीफ़ लाए, लोगों ने आपके पीछे पंक्तियाँ बनाईं, आपने तकबीर कही और लम्बी किराअत की, फिर अल्लाहु अकबर कहा और लम्बा रकूअ किया, फिर समिअल्लाहु लिमन हमिदह कहते हुए खड़े हो गए, और सज्दा न किया बल्कि किराअत शुरू की जो पहली रकअत की अपेक्षा कुछ कम थी, फिर तकबीर कही और लंबा रुकूअ किया जो पहले रुकूअ की अपेक्षा छोटा था, फिर समिअल्लाहु लिमन हमिदह रब्बना व लकल हम्द कही, फिर सज्दा किया, दूसरी रकअत भी उसी तरह अदा की, आपने दो रकअतों वाली नमाज़ चार रुकूअ और चार सज्दों के साथ पूरा किया, नमाज़ समाप्त होने तक आसमान साफ हो चुका था।

यह है सूर्य अथवा चंद्रमा ग्रहण की नमाज़ का तरीका जो जमाअत से दो रकअत अदा की जाएगी लेकिन हर रक्’अत में जरूरत के अनुसार दो या तीन रुकूअ और उसी तरह किराअत होगी, उसके बाद सलाम फेरा जाएगा। चंद्रमा या सूर्य ग्रहण की नमाज़ अदा करने के बाद इमाम को चाहिए कि लोगों को उपदेश दे, लापरवाही से डराए और पश्चाताप का आदेश दे।

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